अलग से सोचो

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अलग से सोचो – ऐप्पल की वस्तुओं की दुकानदारी में ऑर्गैनिक इंटैलैक्चुअल्स का प्रयोग

 उपभोगतावादी संस्कृति को कायम रखने में नेत्रित्वविपरीत बुद्धजीवी व्यक्ति महत्व रखते हैं, चाहे वे केवल मूलभूत बुद्धजीवी ही हों । इस बात को स्पष्ट करता है ऐप्पल के “थिन्क डिफ़्फ़रैंट​” अभियान  ।  ऐप्पल के बनाए माल को आगे बढ़ाने के लिए विज्ञापनों की यह विधि प्रयोग करती है संस्कृतिविपरीत प्रतिमाओं का जैसे कि ऐल्बर्ट आइन्स्टाईन​, जॉन लैनन​,  बॉब डिलन​, महात्मा गांधी, डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर, जिम हैन्सन, मरीया कल्लास​, एमीलिया एयरहार्ट​, मुहम्मद अली, थॉमस ऐडिसन और पाब्लो पिकासो ।

ये प्रतिमाएं मानविक विचारों में क्रांति लाईं थी, और इन के नाम से ग्राहकों को “थिन्क डिफ़्फ़रैंट” अभियान से, ऐप्पल यह सूचित करता है कि इस्तेमाल करने वालों में इस की वस्तुएं भी ऐसी ही करेंगी । इस तरह, ये संस्कृतिविपरीत प्रतिमाएं इस कंपनी की विचारधारा से पूर्णरूप से सही बैठती हैं ।

मैथ्यू आर्नोल्ड के निबंध “स्वीट्नेस्स और लाइट” के अनुसार, “बौधिक मामलों में जिज्ञासा व्यर्थ होती है – केवल एक रोग की तरह । अतः कुछ जिज्ञासा का होना – केवल एक इच्छा ही है उन मामलों के लिए और देखने के लिए कि वास्तविकता क्या है – यह तो बौधिक जीवों का एक प्रक्रितिक सराहनीय स्वभाव है ।”

              आर्नोल्ड का प्रस्ताव है कि बौद्धिक अनुधावन की उपयुक्ति किसी और अंतिम लक्ष्य का मार्ग नहीं बनती, बस यह अपने आप ही में समाप्त हो जाती है ।  इस संकल्प को आगे खींच कर आर्नोल्ड निर्णय करता है कि संस्कृति स्वयं भी केवल संतोशप्रदा का अध्ययन है, “इस लिए संस्कृति को आधार में नहीं माना जाता, बल्कि प्यार और संतोशप्रदा में, क्यों कि संस्कृति स्वयं निपुणता का एक अध्ययनमात्र ही है ।“

इस विचारधारा से निर्णय तो यही होगा कि प्रबुद्ध लोग ही आंदोलनों के संचालक होते हैं । निपुणता का प्रारंभ वही लोग करेंगे जो ऊपर कहे गए “थिंक डिफ़्फ़रैंट​” के व्याख्यान से मिलते हों, न कि कोई भी व्यक्ति जो आइपॉड खरीद सकता हो । इस ढंग से इन व्यक्तियों से संबंध मिला कर, ऐप्पल अपनी वस्तुओं को निपुणता के साथ जोड़ता है ।

ऐंतोनियों ग्रैम्सी अपने निबंध “इंटैलैक्चुअल” में निश्चयपूर्वक कहता है कि बुद्धजीवी होने का सामर्थ्य तो हर व्यक्ति में होता है पर समाज में हर कोई इस भाग में क्रियाशील नहीं हो पाता । ​ ग्रैम्सी एक नई बुद्धजीवी नसल का निर्माण करता है जिसे वह “ऑर्गैनिक इंटैलैक्चुअल (अवयवी बुद्धजीव)” पुकारता है । वह कहता है, “समाज के विभाग अपने निर्माण के साथ साथ इस प्राणी को भी बनाते हैं जो समाज विभाग के विकास का व्यवरण कर सकें । ऐसे लोग अधिकतर विशेषज्ञ होते हैं और विधिपूर्वक दलील कर सकते हैं उन साधारन क्रियाओं की जिन को समाज विभाग ने प्रमुखता दी हो ।”

साधिपत्व की परिभाषा है प्रभावशाली समूहों के वह साधन जिन के द्वारा अधीन समूह, कुछ मान्यताओं को स्वीकार या आन्तरिक कर के, उन की जकड़ में रहते हैं । इसके अनुसार अवयवी बुद्धजीवियों के कार्यभाग को आधिवत्वविपरीत भी माना जा सकता है, क्यों कि वह प्रभावशाली समूहों की मान्यताओं का विद्रोह करते हैं । लैनन और डिलन के विद्रोही संगीत से लेकर डॉक्टर किंग और गांधी के आंदोलनों तक, ये हस्तियां आधिवत्वविपरीति के मूल का प्रतीक हैं ।  अपनी वस्तुओं को इन हस्तियों से संगठित कर के ऐप्पल भी क्रांति का दावा करता है ।

ये बुद्धजीवी ही ग्रैम्सी के “प्रतिनिधियों” के गैरकानूनी विद्रोही हैं । जैसे कि “थिंक डिफ़्फ़रैंट” के नारे के शुरू में कहा गया है, “पेश किया जाता है पागल, अनुपयुक्त​, अक्खड़​, उपद्रवी लोगों के लिये; चौकोर छेदों में घुसी गोल खुंटियों के लिये, जिनकी सोच सब से अलग है ।”

यद्यपि ऐप्पल की वस्तुओं का आधिवत्वविपरीत बुद्धजीवी वर्ग से सम्मिलन उन्हें विद्रोह की छवि तो देता है, पर इस के विरोधाभासी हैं इन वस्तुओं के ऊंचे ऊंचे दाम, जो गांधी या डिलन की दाम श्रेणी में कतई नहीं हैं । ऐप्पल का आइपॉड मिलता है लगभग 25000 रुपयों का, नया आइपॉड टच शुरू होता है 18000 से, मैकबुक 60000 से, और मैकबुक प्रो 120000 से । उनकी हर वस्तु की कीमत प्रतियोगियों से कहीं बढ़ चढ़ कर है । यह स्वाभाविक विरोधाभास इस सामग्री के जादू में विश्वास का एक उदाहरण है, और अपनी वस्तुओं को सबुद्ध वर्ग से सम्मिलित कर के, ऐप्पल उपभोगवर्ग की अलग विचारधारा की आवश्यकता का संबोधन करता है ।

निश्चित है कि प्रस्तुत किए ग​ए बुद्धजीवी प्रशंसा उकसाते हैं और इसी लिए ऐप्पल ने उन्हें अपनी वस्तुओं के प्रतिनिधि रूप में चुना  है । किंतु, ऐप्पल की छाप के वस्तुओं पर उत्कृश्ट गुणों के कारण होने पर भी यह याद रखना आवश्यक है कि ऐप्पल एक लाभ से प्रेरित तत्व है – एक कॉर्पोरेशने । इन हस्तियों की विरासत आज की उपभोगता की संस्कृति के लिये महत्व हो चुकी है । फिर भी, अवयवी बुद्धजीवियों का प्रयोग तो संदेहपूर्वक ही होता है क्यों की इन हस्तियों की उत्कृश्टता चाहे जितनी भी महान हो, वह इन वस्तुओं पर विसरित नहीं हो सकती ।

 

याद रहे, स्टीव जॉब्स ने 14 जून, 2005 के दिन स्टैन्फ़र्ड स्टैन्फ़ोर्ड युनिवर्सिटी में उपाधि प्राप्त करने वालों को दीक्षा दी थी, “भूखे रहो, मूर्ख रहो” ।

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अवयवी बुद्धजीवियों का प्रयोग राजनीती में भी किया जाता है – अनियंत्रित प्रयोग हो तो इसके भयानक निष्कर्ष भी हो सकते हैं ।