तकनीकीतंत्र की अभिभूति: संस्क्रितिविपरीत आन्दोलन के प्रोत्साहन में नवयुवकों का कर्तव्य

संस्क्रितिविपरीत आन्दोलनों में नवयुवकों का सब से बड़ा महत्व है; क्यों कि उनके कटॅरपंथी को चुनौती देने का काम ही ऐसे आंदोलनों को आरम्भ करता है । आज की प्रमुख संस्क्रितियां अपनी मात्रिजनक परंपराओं को और भी पुरानी सोचों मे मिलाने में व्यस्त हैं; वे बस और कुछ भी नहीं करतीं । आगे का रास्ता दिखाने का काम नवयुवकों पर छोड़ा जाता है, और वह भी ऐसे मतभेद के साथ कि युवकों की आवाज़ अकेली ही होती है । हम इन दो लेखों के द्वारा देखेंगे कि कैसे सत्य को फैला कर नवयुवक संस्क्रितिविपरीत आंदोलनों को आरम्भ करते हैं:   सैरा थोर्न्टन का लेख “द सोशल लॉजिक ऑफ़ सब्कल्चरल कैपिटल” और थिओडोर रोस्ज़क का लेख “टैक्नॉक्रेसीज़ चिल्ड्रन” । इन लेखों के सैद्धांतिक प्रस्तावों की विस्तार से तुलना करने पर केवल यही निर्णय होगा कि सामाजिक सुधार के प्रोत्साहित नवयुवक ही होते हैं ।

“द सोशल लॉजिक ऑफ़ सब्कल्चरल कैपिटल” में सैरा थोर्न्टन क्लब उस संस्क्रिति का चित्रण करती है, जो ब्रिटिश नवयुवकों में 1980 के दिनों में मुकुलित हुई थी । उसकी परिभाषा के अनुसार क्लब संस्क्रिति केवल रुचि-अनुसार ही बनती है – जैसे उन लोगों का आकर्षण जिनकी एक जैसे संगीत, संचार-माध्यम और किसी भी वस्तु या अनुभव की पसंद हो ।  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विधि से केवल सामूहिक प्रसन्नता ही इस संस्क्रिति को चलाती है । यह सामूहिक प्रसन्नता ही नवयुवकों की संस्क्रितिविपरीती का मूर्तरूप है । यह धारणा समाज विरोध के समान है और परंपराओं के विरोध का रूप है ।

प्राय: एक जैसी विचारधारा वाले युवक एकत्रित हो जाते हैं, चाहे उनके लक्ष्य भिन्न ही हों । इसकी उपेक्षा, बड़े हो कर लोग लक्ष्यों के छातों के नीचे गुट बनाते हैं, चाहे उनकी विचारधाराएं मिलें या न । नवयुवक इन उपसंस्क्रितियों की विचारधाराओं से अपने को आम जनता से विभिन्नता का प्रदर्षन कर सकते हैं । उपसंस्क्रिति की पूंजी की एक परिभाषा है, पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा से एकत्रित सामाजिक प्रतिश्ठा देने वाला ज्ञान  । इस के अनुसार, उपसंस्क्रिति की पूंजी नवयुवकों में प्रचलित तौर तरीकों और फ़ेशनों की जानकारी की अनुभूति ही है । अतः यह सामूहिक प्रसन्नता ही उपसंस्क्रिति की पूंजी का एक अनमोल रूप है ।

संचार-माध्यम उपसंस्क्रितियों की पूंजियों की मान्यताओं का प्रचार करते हैं । उपसंस्क्रिति-पूंजी समाजिक और आर्थिक वर्गीकरण से अक्सर इतनी जुड़ी हुई नहीं होती जितनी कि संस्क्रिति-पूंजी होती है । यह वर्गीकरण से मुक्ति उपसंस्क्रिति-पूंजी का एक प्रमुख सिद्धांत है, क्यों कि भिन्न समाजिक और आर्थिक दिशा वाले लोग इन उपसंस्क्रितियों में स्वीकार किए जाते हैं । उपसंस्क्रिति-पूंजी की प्राप्ति में सबसे महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय होते हैं आयु, जातीयता और फिर लिंग । इन प्रकृतिक असमानताओं के होने पर भी नवयुवकों की उपसंस्क्रिति अक्सर विचारधारी और समाज के उद्येश्य बनने के समर्थ होती है ।

टैक्नॉक्रेसीज़ चिल्ड्रन में थिओडोर रोस्ज़क समाज के परिवर्तनों में नवयुवकों के कार्य-भाग के महत्व का एक प्रभावपूर्ण ढंग से विवरण देता है । वह शुरू करता है इस देख-रेख से कि संस्क्रिति में जहां भी देखो, लगभग हर भाग में – राजनीति से लेकर शिक्षा तक, और कला से लेकर सामाजिक रिश्तों तक्, जो कुछ भी नवीन है, उन नवयुवकों की देन है जो तंग आकर विरोधी बन चुके हैं – या तो अपने माता-पिता के सोचविचार से और या बुज़ुर्गों के निरंतर भाषणों से ।

आगे चल कर वह तकनीकीतंत्र की परिभाषा कुछ ऐसे देता है, “एक ढांचा जो एक औद्योगिक  समाज को अपनी संगठन-संबन्धी एकीकरण चोटी तक पहुंचाता है” । तकनीकीतंत्रता के मुख्य उद्येश्य होते हैं कार्य​-क्षमता का बढ़ावा और अमीरी की प्राप्ति । अतः इस परिभाषा के अनुसार काबू से भी बढ़कर जढ़वाद ही तकनीकीतंत्र का लक्ष्य है । तकनीकीतंत्रता की तीव्र वेदना से, समाज का हर व्यक्ति विशेषज्ञों पर निरभर होने का स्वाभाविक हो जाता है, और इस तरह से यह तंत्र केवल नियत विशेषज्ञों की पूंजी बन कर रह जाता है और व्यक्तिगत की अपनी हकीकतों के अनुसार फ़ैसले करने की शक्ति खो जाती है, क्यों कि निर्णय तो केवल विशेषज्ञ ही करते हैं । तकनीकीतंत्र समाज के संचालन के लिए, व्यक्तिगत का असशक्तिकरण अनिवार्य है । इस असशक्तिकरण की उपलब्धी के लिए, राज्य करने वाले प्रजा को दलीलें देते हैं, पहले ख़ुद और फिर विशेषज्ञों के विज्ञान की जानकारी के पवित्र प्यालों के द्वारा ।

तकनीकीतंत्रता विशेषज्ञों की राजनीति है । ये विशेषज्ञ या तो राज्य के लिए काम करते हैं और या फिर बहुराष्टीय संस्थाओं के लिए जो राज्यों को चलाती हैं । वास्तव में इन दोनो में कोई मतभेद नहीं है क्यों कि दोनो का काज है तकनीकी के चक्र को अनंत घुमाना । समाजवादी और पूंजीवाद की द्विविधता के तर्क से भी यह तंत्र स्वतंत्र है । अतः समस्या की पूरी जढ़ यह तकनीकीतंत्रता ही है जो उद्योगवाद की पैदाइश है और इसी से परिपूर्ण की ग​ई है बेरुकावट सर्वसत्ता की प्राप्ति के लिए ।

नवयुवकों की संस्क्रितिविपरीती ही तकनीकीतंत्रता से अनंतर युद्ध के लिए सर्वप्रमुख होती है क्यों कि उनकी मान्यताएं माता-पिता वाली पीढ़ी से नितांत रूप से भिन्न होती हैं । नवयुवकों की अव्यायवाहारिक सोचधाराओं और  संभावित बहुपन से ही तकनीकीतंत्रता की अस्वीक्रित हो सकती है । अक्सर विश्वविद्यालय संस्क्रितिविपरीती के आंदोलनों का केंद्र होते हैं क्यों कि यहां पर विद्यार्थी अपने से बड़ों से मिलकर कैंपस में निष्ठा बना कर भिन्नमताविलंबी युवकों के नेत्रित्व को ग्रहण कर सकते हैं । किंतु इस तरह की सोच में एक उदासीपूर्ण विरोदाभास यह है कि तकनीकीतंत्रता की नवीयन के लिए दिमाग भी विश्वविद्यालय ही पैदा करते हैं, और आज के भिन्नमताविलंबी, अगली पीढ़ी के तकनीकी विशेषज्ञों में बदल जाते हैं ।

समाज परिवर्तन की सहायता में नवयुवकों का कर्तव्य तो स्थापित हो गया । संस्क्रितिविपरीती में आगे बढ़ने वालों के पास सामाजिक पूंजी होना आवश्यक है जिसे लेकर वे पूर्ण भाव से अपने बनाए हुए आदर्श राज्य का प्रत्यक्षीकरन कर सकें । जब तक तकनीकीतंत्रता जीवित है, नवयुवकों के साथ जुड़ी हुई संस्क्रितियां दबी रहेंगी । सैद्धांतिक बातों से अलग, नवयुवकों के रीति-रिवाज़ों को नई परिभाषा देने का प्रभाव समाज की सदाचारी के स्वास्थय से भी पक्की तरह मिला हुआ है, और समाज की सीमाएं पार करने पर ही ऐसे परिवर्तन आ सकेंगे ।