कार्पे डियं (वर्तमान में जिओ)

rooms-carpe-diem-dubrovnik-1            जब देव एक छोटा बच्चा था, उसे बाहर खेलने और सुनसान जंगलों में खो जाने में सर्वोत्तम आनंद मिलता था ।  उसे मज़ा आता था अपनी कल्पना को वहां जाने देने पर जहां भी वह चाहे ।  उसका दिल वहीं टिकता था जहां पेड़, कीड़े मकौड़े, समंदर और सांप हों ।  फिर भी रोज़ बेचारे को  स्कूल से सीधा घर आना पड़ता था ।

            देव के माता-पिता उसे कहते थे, “दिल लगा कर  परिश्रम से पढ़ ताकि अच्छे नंबर आएं । तब किसी अच्छे हाई स्कूल में दाखिला हो जाएगा और तुझे खुशी मिलेगी ।”  देव ने उनकी बात सुनी । हर रोज़ वह स्कूल से सीधा घर आ जाता था दिल लगा कर पढ़ने के लिए ताकि उसके अच्छे नंबर आ जाएं और किसी उत्तम हाई स्कूल में दाखिल हो सके  और उसे खुशी मिले  ।

वर्षों बीत गए और अब देव हाई स्कूल में था । देव ने बालावस्था में बड़ी मेहनत की, उसके आशा से भी अधिक नंबर आए और अब वह उसका नाम मेधावी  और उच्च श्रेणी के अध्येता छात्रों में गिना जाता था । अब हाई स्कूल में देव को पेड़ों और कीड़ों की अपेक्षा अपने मित्रों के साथ आनंद आता था । किंतु उसके माता पिता और अध्यापक उसे कह रहते थे, “देव, अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित रखो ।  यदि तुम अब परिश्रम करोगे तो तुम्हारे हाई स्कूल में उच्च नंबर आएंगे, तुम अपनी चुनी हुई यूनिवर्सिटी में जा सकोगे और तब तुम्हें और भी बढ़िया आनंद आएगा ।”

फिर देव ने उनकी बात सुनी, वह मित्रों संग बहुत कम बैठा और प्रचंडता से पढ़ाई पर ही केंद्रित रहा ।  उसने ऐसा किया ताकि वह हाई स्कूल में अच्छे नंबर ले कर अपनी चुनी हुई युनिवर्सिटी में जा कर खुशी पा जाए ।

वर्षों बीत गए और अब देव युनिवर्सिटी में था ।  यदि उसने सोचा था कि स्कूल में उसने बहुत पढ़ाई की थी, तो अब युनिवर्सिटी की पढ़ाई तो कहीं बहुत ऊंचे स्तर पर थी । युनिवर्सिटी में देव को अहसास हुआ कि उसे चित्रकला में मज़ा आता था । चित्रकला उसका भावावेश बन गई । कभी कभी वह घंटों  कल्पना करता था कि किस तरह उसके जीवनकाल में वह महान चित्र बनाएगा ।  उसमें चित्रकला की अद्भुत प्रतिभा थी ।  कभी कभी तो उसे लगता था कि वह महान चित्रकार पाब्लो पिकासो का एक अज्ञात वंशज था ।

अब भी देव के अध्यापक और माता-पिता उसे कहते रहे, “देव, अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित रखो ।  यदि तुम अब परिश्रम करोगे तो तुम्हारे यूनिवर्सिटी में उत्तम नंबर आएंगे, तुम्हें बहुत अच्छी नौकरी मिलेगी और तब तुम्हें सचमुच में आनंद आएगा ।”

अब देव के दिल में एक आंतरिक वाणी उपद्रव मचाने लगी और कहती कि उसके अध्यापकों और माता-पिता का सुझाव गलत था  । यह आवाज़ कहती कि उसे वर्तमान का पूरा लाभ उठाना चाहिए । उसे पढ़ाई के साथ साथ अपनी आनंदमय चित्रकला की भी ओर ध्यान देना चाहिए ।  यह आवाज़ उसे कार्पे डियं का संदेश दे रही थी ।

कभी कभी तो ऐसी आंतरिक वाणी बड़ी प्रतीतिजनक होती  है, पर अंत में यह केवल तर्कशून्य बन जाती  है । देव ने सोचा कि शायद बड़े ठीक ही कहते हों, उसने पूरा ध्यान पढ़ाई की ओर ही दिया, जटिल परिश्रम करता रहा और युनिवर्सटी से आनर्ज़ में पास हुआ, और वह क्लास में प्रथम था  । अब वह जानता था कि उसे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी और वह उसका आनंद पाएगा ।

युनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन के बाद देव को एक बीमा कंपनी के साथ अच्छी नौकरी मिल गई जिसमे वेतन भी बढ़िया था । काम का दिन लंबा होता था पर पैसे बड़े अच्छे मिलते थे, और फिर, वह जवान था और मेहनत करने में हानि ही क्या थी । कई साल बीमा कंपनी के साथ काम करने के बाद, देव का विवाह हो गया । दंपति ने एक अच्छा सा मकान खरीदा और फिर जल्दी ही बच्चे भी हो गए ।

इस नए काज में देव व्यस्त हो गया और लंबे दिन लगाता रहा, यहां तक कि वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कम ही बैठता था । देव के जानने पहचानने वाले उसकी प्रशंसा करते थे और उसकी भविश्य की योजनाएं बनाते थे । उसके भागीदार, उसके नियोक्ता, परिजन और मित्र सब उसे प्रोत्साहन देते थे और कहते थे, “देव तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो, करते रहोगे तो तुम जल्द ही रिटायर हो जाओगै । तब तुम्हें बहुत खुशी मिलेगी ।”

वर्षो बीत गए और अब देव बीमा कंपनी की नौकरी से रिटायर हो गया । अब तक उसकी औलाद बड़ी हो चुकी थी और उनके भी बच्चे हो रहे थे । धीरे धीरे उसके दिल की गहराई से एक भूली हुई मौन आवाज़ उससे कुछ कहने लगी । देव ने इस आवाज़ को पहचान लिया, यह वही आवाज़ थी जो उसे युनिवर्सिटी के दिनों में चित्र बनाने के लिए कहती थी । आवाज़ बड़ी धीमी थी और वह उसे मुश्किल से ही समझ पाया ।  इसे भूल गया और अब अपनी पत्नी के साथ नित्य चर्च जाने लगा ।

चर्च सर्विस के समय, देव इधर उधर झांकता था । उसने देखा कि वहां अधिकतर बुज़ुर्ग लोग ही आते थे जिनमें से कई उसके मित्र थे । देव हैरान होता था कि जवान लोग चर्च में क्यों नहीं आते थे । एक दिन देव अपने चर्च वाले मित्रों से बात कर रहा था । फिर उसका एक मित्र, जो रिटायर हुआ पोलीस अफ़सर था, कहने लगा, “देव बहुत अच्छा है कि रिटायर होने के बाद तूने चर्च आना शुरू कर दिया । इस तरह मरने के बाद तू स्वर्ग में जाएगा, वहां तुझे खुशी मिलेगी ।”

इन शब्दों के बाद देव की आंतरिक वाणी, अपने लंबी अवधि के अचेत से उठी, जैसे एक शांत ज्वालामुखी फूट पड़ता है ।  देव को अहसास हुआ की उसने अपना जीवन व्यर्थ कर दिया है, कितने वर्ष बिता दिए हैं उस खुशी की तलाश में जो मृग त्रिश्णा की तरह उसकी पहुंच के बाहर अगले मोड़ के बाद ही रही है ।

वह उठा और अपनी पत्नी और मित्रों से बोला, “माफ़ कीजिए…. मैं ज़रा टहलने जा रहा हूं, अकेला ।”

चलते चलते, देव, शहर के अंत के एक समाधी स्थल पर पहुंच गया  ।   जैसे कि एक दैविक शक्ति उसे खींच रही हो, उसके कदम उसे एक समाधी पर ले आए । एक छायादार वृक्ष इस समाधी को धूप से बचा रहा था पर फिर भी सूर्य कि किरणे इसे रोशन कर रहीं थी ।

देव  ने समाधि-शिला को पास आकर देखा तो विस्मय हो गया । यह उसकी अपनी ही समाधी थी । इस पर दो अनजाने शब्दों में एक शिला-लेख था, ” कार्पे डियं ” ।

बालक देव सोते सोते डर से उठ गया, सारी रात कर्वटें पलटता रहा था: किंतु यह जानकर वह प्रसन्न था कि यह केवल एक भयानक सपना था । वह शुक्र मना रहा था कि उठने पर वही बालक था जिसका दिल वहीं टिकता हो जहां पेड़, कीड़े मकौड़े, समंदर और सांप हों । वह जल्दी ही इस डरावने सपने को भूल गया सिवाय एक छोटे से भाग के जो इसके चैतन्य में टिका रहा ।

अगले दिन देव स्कूल गया और कक्षालय में जा कर अपने स्थान पर बैठ गया । उसने सामने वाले चाकबोर्ड पर देखा तो वहां बड़े बड़े अक्षरों में दो शब्द लिखे हुए थे, ” कार्पे डियं” । इन दो शब्दों को देखकर उसे सारा सपना याद आकर उसके अस्तित्व में समा गया । यह अस्तित्व उसके लिए प्राय: चेतावनी बन गया ताकि अब अपने आप को वह खुशी के लिए मृग त्रृश्णा के के समुद्र की ओर फिसलने की अपेक्षा  वर्तमान में भर कर जिए ।  देव ने एक गहरी सांस ली और  फिर वह मुस्कराया । “आज” उसका सबसे महान दिन बन गया ।