एकांत पर चिंतन

reflections

“हम आत्मिक अनुभव वाले मानव नहीं हैं । हम आत्मिक जीव हैं जिन्हें मानव होने का अनुभव है ।”- पीयर ताईल्हार्ड दि शार्दिन ।

एकांत । यह अमिट सत्ताओं का एक पवित्र अमृत है जिस की एक बूंद मात्र, समय समय पर, जीवन को एकत्व और संतुलन प्रदान कर सकती है । मैं एकांत उस अवस्था को नहीं कह रहा जब कोई अकेलेपन में इन्टरनैट, टैलीविज़न, फ़िल्मों या किताबों में शरण ले रहा हो । यद्यपि इन सब का अपना मूल्य है पर यह एकांत नहीं है । मेरी परिभाषा में एकांत वह स्थिति है जब कोई अपने साथ केवल निजी अवस्था में होता है – ताम झाम, मन बहलावे और किसी अनावश्यक सोच से रहित । इस प्रकार के एकांत के लिये, स्वयं को उन संवेदन प्रेरणाओं से मुक्त होना पड़ता है जिन्हों ने आज हमारे आधुनिक समाज को जकड़ा हुआ है ।

हमारा समाज हमे क​ई विकर्षण बड़ी धूमधाम से देता है । यह विकर्षण आसान बना देते हैं कि हम निजि विचारों से अलग हो जाएं और कपटपूर्ण हो कर समाज को अपना हर्ष भाव दिखाएं । इस तथ्य के कई उदाहरन रोज़ मिलते हैं । आप ने कई बार देखा होगा कि कोई गली में चल रहा है या बस में बैठा हुआ है – हाथ में आइपॉड ले कर । टैलीविज़नों का बहुजनन भी एक ऐसा ही उदाहरन है – वह अब हर जगह छाए हुए हैं – अखाड़ों से ले कर लिफ़्टों में । आप एक पुस्तक भंडार (पुस्तक भंडार !) में भी नहीं जा सकते बिना रेडिओ से लोकप्रिय नए गीतों की बौछार के । क्यों कि विकर्षण हर स्थान पर हैं, जीवन का मार्ग अधूरा हो जाता है और कोई भी निजि संभावनाओं से प्रसन्न नहीं रहता ।

मेरी इस कथन विधि का उद्येश्य न तो उपहास है, न ही टोकाटाकी और न ही यह दिखाना की आज कल के जीवन में कठुर गिरावट आ चुकी है । मेरा लक्ष्य तो केवल यह    प्रदर्शित करना है कि कभी कभी समाज से हट कर एकांत की शरण लेना लाभमंद  है । इस के लिए सन्यासी या आन्तर्मुखी बनना आवश्यक नहीं है । अपने बोध की जांच की प्रतिक्रिया केवल लाभदायक ही नहीं, आवश्यक भी है । मेरे अधिकतर पाठक अब तक कल्पना कर रहे होंगे कि यह प्रतिक्रिया तो उनके लिये असंभव है क्यों कि हर एक के अपने सांसारिक कर्तव्य और उत्तरदायित्व हैं । इस भावना के कार​ण पाठक मेरे जैसे लोगों को आदर्शवादी का नामपत्र देंगे और सोचेंगे कि यह सपनों की दुनियां में रहते हैं और इनके चरण इस धरती की हकीकतों में जड़े हुए नहीं हैं ।

शायद मैं एक भावुक व्यक्ति हूं । हो सकता है कि मेरे कोमल स्वभाव के रूप में मुझे एक भेंट मिली हुई है जिसके कारण मैं स्वयं को संकटकाल में अपने बोध को समर्पण कर देता हूं । तथापि विधिपूर्वक, इस अन्दुरूनी आवाज़ को अनुमति देने के स्वभाव ने ही मुझे मेरे सपने इच्छाएं, उम्मीदें और खुशियां मिलाई हैं और यही भाव मुझे आगे बढ़ने की शक्ति देता है । और यही अन्दुरूनी आवाज़ मुझे प्रेरणा करती है कि मैं अपने सपनों, इच्छाओं, उम्मीदों और खुशियों को सब के साथ बांटूं । इसी अन्दूरूनी आवाज़ ने ही मुझे प्रेरित किया है कि मैं उन वीरों के गुणगान लिखूं जिन्हों ने निर्भय हो कर जीवना की गम्भीरता को जाना था ।

हमारी दुनियां में आत्मत्व केवल कलावादिओं का विभाग है । सब सीधे हल चाहते हैं,  गम्भीरता से सोचे बिना । यह रास्ता संक्षिप्त रूप में अन्तरदर्शन के भय का प्रतीक है, जो भय आज के मानव की बीमारी बन चुकी है । हालां कि हम सब में एक पवित्र स्थान है, पर उस मे बहुत ही कम लोग रहते हैं । केवल एकांत ही इस पवित्र स्थान का दरवाज़ा खोल सकता है, जिस से जीवन में एकत्व और समानता वापिस आ सकते हैं, और उस के साथ साथ केवल जीवन की स्पश्टता और दूरदर्शी के अतिरिक्त लक्ष्य और अर्थ भी मिल सकते हैं । यह अनमोल एकांत का अमृत जो देवी- देवताओं का पराग है और जो उस अमरपक्षी को जगा सकता है जो हम सब में है पर वह सोते हुए प्रतीक्षा कर रहा है कि कोई उसे राख में से उठाए ताकि वह अपने पंख फैला कर उड़ सके ।