सर्वप्रिय शिष्य

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शिक्षक मैडम वर्मा

            मैडम वर्मा एक ओजस्वी और मनोहर शिक्षक थीं । जैसे भी देखें, वह रूपवती तो थी हीं, किन्तु उनमें एक और गुण भी था जो लोगों को मोह लेता था । वह विशेष गुण था, एक अप्रथ्यक उत्साह का तेज , यानि  एक मिक्नातीसी आकर्षण, जिस के कारण लोग उन के इर्द गिर्द खिंचे रहते थे । उन की चाल भी चील की उड़ान की तरह फ़ुर्तीली और मनोहर थी । उन की शक्ती भरी मुस्कान एक बर्फ़ के टीले को भी पिघला देती थी । उन की आंखों मे हीरे चमकते थे जैसे एक स्पश्ट रात में सितारे जगमगा रहे हों । यह असंभव था कि किसी को इस तरुण और जोशमान नारी से एक किस्म के प्यार की संभावना न हो ।

तीन विद्यार्थी

   एक दिन मैडम वर्मा के तीन विद्यार्थी, स्कूल से घर जाते हुए बहस करने लगे कि कौन मैडम का सर्वप्रिय शिष्य है । हर एक को पूर्ण विश्वास था कि वह ही मैडम के ह्रिदय में सर्वप्रिय​ है । विद्यार्थिओं ने एक उपाय निकाला । हर कोई अपने ढँग से मैडम से पूछेंगे कि वह उन के सर्वप्रिय हैं या नहीं ।

शरारती विद्यार्थी रशीद

                पहला विद्यार्थी था रशीद जो प्रायः शरारत करता था और मुसीबत में फस जाता था । किंतु मैडम वर्मा के साथ वह हमेशा शांत और ध्यानमंद रहता था । मैडम भी उस पर आदर्मय और दयालू थी । स्कूल के बाद, जब बाकी विद्यार्थी कक्षालय छोड़ चुके थे, रशीद मैडम के पास आया और शर्मीला हो कर पूछने लगा, “मैडम माफ़ करना, पर मैने आप से एक सवाल पूछना था” ।

                मैडम वर्मा मुस्कराईं, “हां रशीद बोलो तुम्हारी सोच में क्या है “।

                “मैं सोच रहा था….क्या मैं आपका सर्वप्रिय शिष्य हूं ?”

                मैडम वर्मा ने विद्यार्थी की आँखों में सीधे देखा और कहा,”हां रशीद सचमुच तुम मेरे सर्व्प्रिय शिष्य हो ।”

                रशीद खुशी से नाचता हुआ कक्षालय से निकला । अब वह इन्तज़ार मे था कि दूसरों को कैसे यह खुशखबरी सुनाए ।

लोकप्रिय सरस्वती

                दूसरी विद्यार्थी थी सरस्वती, जो स्कूल की लोकप्रिय​ लड़कियों मे थी और उसे वह सैरा कह कर पुकारते थे । सैरा पढ़ाई मे तो अछी थी ही पर अतिरिक्त क्रियाओं में भी भाग लेती थी । सैरा को रशीद की बात का ज़रा भी विश्वास न हुआ । वह जानती थी कि वह ही मैडम की सर्वप्रिय शिष्य है । आगले दिन, स्कूल के बाद, अपने इस दृढ़ विश्वास से भरपूर, मैडम के पास आई “मैडम माफ़ करना, पर मैने आप से एक सवाल पूछना था ।”

                मैडम वर्मा मुस्कराईं, “बेशक सैरा, बोलो क्या सोच रही हो ।”

                “मैं सोच रही थी….क्या मैं आप की सर्वप्रिय शिष्य हूं ।”

                मैडम वर्मा ने विद्यार्थी की आँखों मे सीधे देखा और कहा,”हां सैरा सचमुच तुम मेरी सर्वप्रिय शिष्य हो ।”

                सैरा अपना विजयी सिर गर्व से ऊँचा कर के निकली । अब वह इसी इन्तज़ार मे थी कि दूसरों को कैसे यह खुशखबरी सुनाए ।

होनकार बॉबी

                तीसरा विद्यार्थी बॉबी था, एक एकांत और अन्तर्मुखी लड़का । बॉबी पढाई में तो साधारन ही था, किंतु उसमे क​ई और हुनर थे । बॉबी को दोनों चिद्यार्थिओं की बात सुन कर अचम्भा हुआ क्यों कि, असल में, वह जानता था कि वह ही मैडम वर्मा का सर्वप्रिय शिष्य है । अगले दिन, स्कूल के बाद, बॉबी मैडम के पास आया और उस ने पूछा, “मैडम माफ़ करना, पर मैने आप से एक सवाल पूछना था” ।

                मैडम वर्मा मुस्कराईं, “हां बाबी बोलो तुम्हारी सोच में क्या है “।

                “मैं सोच रहा था….क्या मैं आपका सर्वप्रिय शिष्य हूं ?”

                मैडम वर्मा ने सीधे विद्यार्थी की आँखों मे देखा और कहा,”हां बॉबी सचमुच तुम मेरे सर्व्प्रिय शिष्य हो ।”

                बॉबी कमरे से चुपचाप पर हर्षपूर्ण हो कर निकला । अब वह इस इन्तज़ार मे था कि दूसरों को कैसे यह खुशखबरी सुनाए ।

 तीनो विद्यार्थी व्याकुल हो ग​ए 

       जब तीनो विद्यार्थिओं ने मिल कर अपनी अपनी कहानी सुनाई तो वह इस अवस्था से व्याकुल हो ग​ए । हर विद्यार्थी ने मैडम के पास जा कर वही प्रश्न पूछा था और प्रत्येक को मैडम ने वही उत्तर दिया था । मैडम ने तीनो विद्यार्थिओं मे से हर एक को कहा था कि वे ही उनके सर्वप्रिय शिष्य हैं । ऐसा कैसे हो सकता है ? तीनो ने तय किया कि वह इस बात का पूरी तरह निर्णय मैडम से करवाऐंगे ।

                अगले दिन तीनो मैडम के पास ग​ऐ और मांग की कि मैडम समझाऐं क्यों उन्होने तीनो को अपना सर्वप्रिय शिष्य कहा था । इस पल उस शिक्षक का चेहरा दमकने लगा और एक दम तेजस्वी हो गया । ऐसे लग रहा था जैसे उनके चेहरे से एक विशेष सुनहरी रोशनी निकल रही हो । उन्होंने बोलना शुरू किया, “मैने तुम तीनो को कहा था कि तुम मेरे सर्वप्रिय शिष्य हो क्यों कि जिस पल तुम मेरे पास थे, तुम मेरे सर्वप्रिय थे ।

मैडम वर्मा के तीन जीवन सिद्धांत

             मैडम ने अपने विद्यार्थिओं की ओर देखा तो जान ग​ईं कि वह असन्तुश्ट और आश्चर्य​ से व्याकुल थे किंतु उन में आगे समझने की आकांक्षा थी । वह समझाती ग​ईं, “मैं अपना जीवन तीन सिद्धान्तों से जीती हूं । मेरा पहला सिद्धान्त है कि वर्तमान समय ही प्रमुख्य है । दूसरा कि सब से मुख्य व्यक्ति वही है जो वर्तमान में मेरे साथ है । यह कभी नहीं बदलता । मेरा पूरा ध्यान और सोच उसी व्यक्ति पर होते हैं जो उस समय मेरे साथ होता है । मेरा तीसरा सिद्धान्त है कि मेरा प्रमुख्य काम यही है कि जो मेरे साथ है मैं उस से प्यार करूं । यह भी कभी नहीं बदलता  । पूरी तरह से मेरे ध्यान और क्रिया यही हैं कि मैं उस से प्रेम करूं जो उस पल मेरे साथ हैं । हर पल में जो भी विद्यार्थी मेरे पास हों वही मेरे सर्वप्रिय होते हैं ।“

                तीनो विद्यार्थिओं ने नम्रता से और श्रद्धा की सम्भावना से अपने दयालू शिक्षक की सराहना की ।  यही नहीं, तीनों को अब अहसास हुआ कि मैडम वर्मा ने हर एक से सच बोला था क्यों कि मैडम ने अपना सर्वप्रिय शिष्य तभी कहा था जिस पल वे उन के साथ थे ।

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