शतरंज का अन्वेषक

भारत की एक पुरानी कहानी पर आधारित

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अमीर असंतुश्ट राजा

प्राचीन काल में, उत्तरी भारत में एक बड़ा अमीर राजा था । उसके पास धन की तो कोई कमी नहीं थी पर वह अपने मनोरंजन के साधनों से असंतुश्ट था । उस ने क​ई लोगों से उसके मनोरंजन  के लिए नवीन आविष्कार करने का निवेदन किया ।

राजा: इसके परिवार के लिए दस साल तक खाने के लिए चावल दे दो  

एक बार एक बुद्धिमान मनुष्य राजा के पास आया । उस के हाथ में थे एक चौसठ खानों वाला फट्टा और बत्तीस मूर्तियां – सोलह सफ़ेद और इतनी ही काली । उसने अपने कलाकार कारीगरों से ये वस्तुएं बनवा कर शतरंज नाम के एक न​ए युद्ध के खेल का आविष्कार किया था । उत्सक राजा के पास वह फट्टा और मूर्तियां लाया और उसने सारे राजदरबार को शतरंज का खेल सिखाया । राजा इस खेल से बहुत प्रसन्न हुआ । उसने कहा कि इस आदमी को इसके परिवार के लिए दस साल तक खाने के लिए चावल दे दो ।

राजा के सामने अन्वेषक नम्रता से झुका और कहने लगा, “महाराज आप बहुत दयालू हैं, मैं यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता” ।

अन्वेषक ने एक दूसरा प्रस्ताव प्रस्तुत किया

फिर अन्वेषक ने एक दूसरा प्रस्ताव प्रस्तुत किया, “महान सम्राट, मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं । मेरी तो केवल यही इच्छा है कि मुझे शतरंज के हर खाने के लिए कुछ इनाम दिया जाए । पहले दिन, फट्टे के पहले खाने के लिए चावल का एक दाना, दूसरे दिन अगले खाने के लिए दो दाने, तीसरे दिन तीसरे खाने के लिए चार दाने चावल, और इसी तरह हर बार अगले खाने के लिए पिछले दिन से दुगने दाने दे दो जब तक इस फट्टे के चौसठ खानों का इनाम मिल जाए । इस से मुझे बहुत हर्ष होगा ।”

राजा आविष्कारक की बात सुन कर हँसा, “क्या सच में, यही तुम्हारी इच्छा है ?” ।

आविष्कारक ने झुक कर कहा, “हां, महान सम्राट”।

राजा ने हर्षपूर्वक हंस कर उस व्यक्ति की बात मान ली ।

क्यों कि यह पहला दिन था, वह व्यक्ति अपने पूरे परिवार के लिए चावल का एक दाना ले कर घर गया । उसकी पत्नी सोच रही थी कि उसका पति मूर्ख है क्यों कि उस ने राजा के पहले प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था । इस तरह वह अन्वेषक दूसरे दिन दो दाने चावल लाया, तीसरे दिन चार और चौथे दिन आठ । उस की पत्नी उस से झगड़ा और गाली गलौज़ करने लगी; किन्तु वह सहनशील व्यक्ति अपनी योजना पर टिकाऊ रहा, और हठ करता रहा कि उसका संपूर्ण परिवार राजा के दिए गए चावलों से जी सकेगा ।

अन्वेषक की पत्नी गुस्से से भरी हुई थी

इसी तरह वह पांचवें दिन 16 दाने चावल लाया, छटे दिन 32 और सातवें दिन 64 । अन्वेषक की पत्नी गुस्से से भरी हुई थी, और बच्चे भूखे थे । आठवें दिन जब वह 128 दाने चावल घर लाया, उसे शतरंज के फट्टे की पहली पूरी कतार का इनाम मिल चुका था । इसी प्रकार नौवें दिन वह 256 दाने चावल लाया, दसवें दिन 512,और  ग्यारहवें दिन 1024; उस के परिवार के सदस्यों ने इन चावलों से छोटा सा भोजन तो किया पर​ वे खाने के बाद भी भूखे थे । फिर भी अब परिवार में तनाव थोड़ा कम​ हो गया । बारहवें दिन वह 4096 दाने चावल लाया और तेरहवें दिन 8112  । सोलहवें दिन जब उसे दो कतारों के पूरे होने का इनाम मिलना था, वह 32448 दाने चावल लाया । अन्वेषक के परिवार ने एक बड़ी पार्टी की और उसमें  गांव के लोगों को भी शामिल किया ।

इतने चावले उगाने मे लगभग 700 साल लग जाएंगे

चलते चलते जब उसे चौबीसवें खाने की कीमत देने के लिए 8388608  दाने चावलों की आवश्यकता थी, पर अब​ अस्सी लाख दाने चावल तो महल में भी नहीं थे । अतः राजा और उसका परिवार भूखे रहे । राजा के क​ई नौकर भी अब अन्वेषक के लिए काम करने लगे । अब वे उसे पूरे राज्य से चावल करने की सहायता करने लगे । अन्वेषक नें राजा को भी भोजन के बदले काम करने के लिए रख लिया और स्वयं सिंहासन को संभाल लिया । बत्तीसवें खाने का हरजाना था एक अरब चावल के दाने । इतने चावल तो सारे राष्ट्र में भी नहीं थे, और चौसठवें खाने की कीमत होती 10,000,000,000,000,000,000 से भी अधिक दाने चावल । अगर संसार के सारे देश केवल उस अन्वेषक के लिए ही चावल उगाएं, तो भी इतने चावले उगाने मे लगभग 700 साल लग जाएंगे ।

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